प्रकृति से एकात्मता
(ਲੇਖਕ ਗੁਰਸ਼ਰਨ ਸਿੰਘ ਕਾਕਾ ਆਪਣੀਆਂ ਲਿਖਤਾਂ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਨੇੜਿਉਂ ਤੱਕਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਵਾਰਤਕ ਟੁਕੜੀ ਵਿੱਚ ਉਹ ਤੁਹਾਨੂੰ ਕੁਦਰਤ ਨਾਲ਼ ਇੱਕ-ਮਿੱਕ ਹੋਇਆ ਮਿਲ਼ੇਗਾ – ਸੰਪਾਦਕ।)
आज सुबह पार्क में बैठा प्रकृति को निहार रहा था। सामने पेड़ों की हरियाली और उनके खिलने का नज़ारा एक अद्भुत रूप लिए हुए था। फ़ाख्ता (घुग्गी) की ‘घूं-घूं’, चिड़ियों की ‘चूं-चूं’ और अन्य पक्षियों की मधुर आवाज़ें कानों को सुनने का असली महत्व याद दिला रही थीं। आँखें प्रकृति के रंगों का अहसास करा रही थीं।
जब ठंडी हवा मेरे चेहरे को छूकर गुज़री, तो मन ताज़गी से भर गया। मैं अपने भीतर की आवाज़ सुनकर इस सुहावने पल को महसूस कर रहा था। जब हल्का सा उजाला हुआ, तो ऐसा लगा जैसे रात और दिन का मिलन हो रहा हो। शायद इसी रूहानी अहसास को ईश्वर का रूप कहा जाता है। इस एक क्षण में उपजे विचार ने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया और मेरी क़लम ने इस अहसास को शब्दों का रूप दे दिया।