डॉ. मनमोहन सिंह के उपन्यास “मन पंखी भयो” के हिंदी अनुवाद का विमोचन और मासिक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन – विजय कपूर
Chandigarh (sehajdhara bureau), 04 October:
अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था चंडीगढ़ द्वारा पंजाब यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन स्ट्डीज़ के सहयोग से पूर्व आई पी एस और चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. मनमोहन सिंह के उपन्यास “मन पंखी भयो” के हिंदी अनुवाद का विमोचन पंजाब यूनिवर्सिटी में तीन अक्टूबर को आयोजित हुआ। कार्यक्रम संयोजन और संचालन रहा वरिष्ठ साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर का। कार्यक्रम की मेज़बानी की ग़ज़लकार आर के बेनीवाल ने। उपन्यास पर परिचर्चा में भाग लेते हुए अपनी टिप्पणी में वरिष्ठ साहित्यकार विजय कपूर ने कहा “मन पंखी भयो” उपन्यास केवल एक कथात्मक विवरण नहीं है, बल्कि पंजाब के इतिहास संगीत धर्म और समाजशास्त्र की पृष्ठभूमि पर बुना गया एक अस्तित्ववादी, रूहानी और सामाजिक राजनीतिक दर्शन का सघन प्रस्तुतीकरण है।” साहित्यकार सीमा गुप्ता ने कहा “साहित्यिक दृष्टि से ‘मन पंखी भयो’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल बोधे की जीवन-कथा नहीं रह जाता, बल्कि उसके माध्यम से एक पूरे समय, समाज और संस्कृति को सामने लाता है।”

शिक्षाविद् और चिंतक डॉ रविंदर कौर ने कहा “मन पंखी भयो एक वैचारिक रूप से महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक उपन्यास है, जो स्वतंत्रता, अस्मिता, स्मृति और इतिहास के अंतर्संबंधों की पड़ताल करते हुए दिखाता है कि राजनीतिक सीमाएँ और सामुदायिक विचारधाराएँ ऐतिहासिक विभाजन के बाद भी मनुष्य को भीतर से बाँधती रहती हैं।” शिक्षाविद् और चिंतक डॉ पंकज श्रीवास्तव ने कहा “यह उपन्यास मेरी दृष्टि में मात्र इतिहास का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भटकते हुए मन को आत्मा के मूल संगीत और सह-अस्तित्व से जोड़ने की एक आकुल पुकार है।” डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने उपन्यास के बारे में बात रखते हुए कहा ‘मन पंखी भयो’ केवल एक कालखंड की कथा नहीं, बल्कि इतिहास के भीषण संताप के बीच मनुष्य की चेतना, सामाजिक न्याय और आंतरिक शांति को पुनर्जीवित रखने, शब्दों और संगीत के नादब्रह्म में उस अनश्वर रूहानी सत्य को खोजने का मेरा एक दार्शनिक प्रयास है।’
विमोचन के बाद कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ट्राइसिटी के जाने-माने साहित्यकारों ने अपनी काव्यात्मक रचनाएं से मंत्रमुग्ध कर दिया। आर.के.”सुख़न ने पढ़ा मिरे बच्चे सयाने हो गए हैं अलग उनके ठिकाने हो गए हैं। विजय कपूर ने “कुकनुस्स फिर से जी उठा था, राख के ढेर से, प्रेम और जीजीविषा का पंख फैलाकर, यह सिद्ध करने के लिए कि, घृणा केवल एक क्षणिक अँधेरा है, और प्रेम ही इस सृष्टि का शाश्वत, असीम नाद” सीमा गुप्ता ने “सीमा गुप्ता कवितांश मुझे प्यार रहा उसके रंग से उसके पानी उसकी गहराई उसके सीप मोती शंख या उनमें तैरती रंग तो बेरंग मछलियों से” अर्चना सिंह ने सुनाई “मैं ठीक हूँ! तुम्हारी रोशनी की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मैं भीतर से चमकूंगी” रवीन्द्र टंडन ने “महज़ तेरे आने की आहट ही मेरे गुम शुदेह सुकून का इम्तहान है” प्रतिभा सिंह ने “सजन तुम प्रेम पत्र लिखना” प्रसून प्रसाद ने “कोई और ही था जो उसे घूर रहा था उसका होना अब जायज़ नहीं रह गया शायद यही कह रहा था” डॉ सारिका धूपड़ ने “परिस्थितियाँ कष्ट दें, चाहे शरीर पीड़ा पाए, समता वह दीप है, जो दोनों छाया हर जाए विषमता, कष्ट या दुःख; कदापि ना घबराएं मानसिक संतुलन हर दर्द से निजात दिलाए” विमल कालिया विमल ने “बनाओ तो खूबबनाओ तो बहुत सारी बन जाती हैं बातें वो दिन की कहता रहता है रात तक ख़त्म कहाँ होती हैं बातें।”
सुषिरा गुलाटी ने, “तुझे रहना है जो रौशन मशालों सा, आँधियों से तुझे लड़ना होगा, अटल रहना होगा इरादों में अपने, रूख तकदीर का भी मोड़ना होगा” बी बी शर्मा ने “थक जाएँ आराम करें,थकान न ओढ़ेरुक जाएँ विश्राम करें, चलना न छोड़े” पारस ने पढ़ी किसी अनजाने को आवाज़ देखना अच्छा लगता है , इस गीत को अलफ़ाज़ देना अच्छा लगता है ” दर्शना सुभाष पाहवा ने “सरोवर में जब जल बढ़ जाए तो कुछ जल निकालना ही, सही उपाय होता है।” शहला जावेद ने “बोनसाई सी लगती अब ज़िंदगी जल्दबाज़ी और काट छांट है जिंदगी में बरगद के पेड़ सा ठहराव सुकून नही अब जिंदगी में” तिलक सेठी ने “लोग लगे हैं सारे अपने धंधों में/ रोटी की खातिर ही सारी कसरत है।” रोमिका वडेरा ने “रावण दहन करना हर कोई चाहता है सदियाँ बीत गई रावण को हराने की चाह लिए पर ये रावण है कि यूँ ही खड़ा है दशों शीर्ष अपने कंधों पर आसीन किए हुए”

डॉ प्रेम ओझा ने “किसी के आँसू पढ़ लेना, करुणा का विस्तार है/ बिना कहे जो दर्द को समझे, वही हृदय साकार है” अन्नू रानी शर्मा ने… “ज़िंदगी में मुश्किलों को आज़माना सीखकर/ चल चला चल आँसुओं में मुस्कुराना सीखकर” अशोक वडेरा ने “ये जो महिन महीन सितारे हैं न इस आसमानी चादर में ये सब सिर्फ तुम्हारे ही तो नहीं कुछ तो मेरे भी हैं इसमें अपने” कृष्णा गोयल ने “लक्ष्य जीतना है तो बस यही सोचिए तीर बाकी हैं अभी मेरी कमान में” एस. के. सिंह ने ‘’ मैं तुम्हें जानता हूँ | तुम घुमते हो पार्क , बाज़ार , चौराहों पर भगवा , हरा सा कोई नक़ाब पहने हुये ‘’ सतिंदर कौर ने… “शब्द केवल ध्वनियाँ नहीं, मन के सच्चे परिचायक हैं। इनसे ही बनते रिश्ते अनमोल, जीवन के ये संचालक हैं।” निर्मल सूद ने “अनगिनत आँधियों, तूफ़ानों, झँझावातों से जूझती, मुश्किलों से बच कर आती कसमसाती, हाँफती जिजीविषा।”

डॉ शिप्रा सागर ने “अंतर्मन के भावों का उदगार है हिंदी भाषा नहीं मेरी तो पहचान है हिंदी” सुरेन्द्र पाल सोनी काकड़ौद ने “अब बिन बचपन जीते बच्चे हैं कट रहे बुजुर्गों से बच्चे जायदाद हुई बँटकर छोटी पगड़ी के रक्षक चले गए/ अच्छे दिन नहीं आने वाले अच्छे दिन तो चले गए।” परमिंदर सोनी “बहुत से सवाल ज़हन में कुलबुला रहे सुबह से शाम चुंधियाई ऑंखों पर हाथों की छतरी बना करूं तलाश लुका छिपी करते जवाब “ममता ग्रोवर ने “धुंधली स्मृतियों के झरोखों से मन क्यूँ बुनने लगता है अतीत का ताना – बाना” राजिंदर कौर ने “वो बहुत ही सलीके से अपनी दास्तां सुना रहा था।” सत्यभामा ने “यदि खत लिख पाती तो/ नहीं लिखा मैंने कोई खत या प्रेमपत्र शब्द मृतप्राय हो गए” कार्यक्रम में आधार प्रकाशन के प्रमुख देश निर्मोही, जया सूद, रूपेश कुमार, सुरिंदर कुमार और श्री कालहा ने भी भाग लिया।